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उभरता संकट - बैंकों के बढ़ते एनपीए और घटती जवाबदेही - Hindi Version of "Unfolding Crisis: The Case of Rising NPAs and Sinking Public Accountability"



After the successful release of "Unfolding Crisis: The Case of Rising NPAs and Sinking Public Accountability" on 14th September, the Hindi version of it was released at the recently held 11th Biennial NAPM Convention in Patna held from 2-4 December, 2016. Please find the pdf for the Hindi document, "उभरता संकट - बैंकों  के बढ़ते एनपीए और घटती जवाबदेही"|

If you want to order hard copies of the Hindi report, then please drop a mail to himanshudamle@pfpac.net






पिछले दशक में, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) या ​​डूबे लोन में अप्रत्याशित बढ़ोतरी  को अब और  नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है| मार्च 2007 से मार्च 2016 के अंतराल में भारतीय बैंकों के एनपीए मात्र 50,517 करोड़ रुपये से बढ़कर  5,41,763 करोड़ रुपए तक पहुँच चुके हैं | इस अप्रत्याशित वृद्धि की सबसे खतरनाक बात,इसके सिर्फ छ: महीनों  (सितंबर 2015 से मार्च 2016) के अंतरालमें एनपीए में 46% की  भारी बढ़ोतरी है| यह हमे डूबे लोन के उभरते संकट के बारे में आगाह करता है |  इसका भयंकर दौर आना अभी बाकी है | 

बैंकों, आरबीआई और वित्त मंत्रालय ने सामूहिक रूप से इस संकट का जिम्मेदारभारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्विक वित्तीय बाज़ार और इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित  विकास के अनुमानों की अनिश्चितताओं के साथ गति बनाए रखने में असफल रहने को ठहराया  है |यह सिर्फ एक अनुमान है, फिर भी अगर हम इस दावे को मान लें कि यह संकट अस्थिर आर्थिक स्थिति की अनियमितता का परिणाम है, तब भी यह स्पष्ट है कि भारत सरकार और आरबीआई, बैंकों जिसमे विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर पर्याप्त विनियामक तंत्र लागू करने में विफल रहे हैं और लोन देने के लिए मज़बूत जोखिम मूल्यांकन प्रोटोकॉल लागू कर एनपीए को बढ़ने सरोकने में विफल रहे हैं| 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के डूबे लोन की अत्याधिक  मात्रा देखकर चिंता बढ़ जाती है क्योंकि, इनकी तुलना में निजी क्षेत्र के बैंक एनपीए का स्तर कम रखने में कामयाब रहे हैं । विभिन्न बैंकों के कुल एनपीए में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हिस्सा वर्ष 2008-09 में 65.54% से बढ़कर वर्ष 2014-15 में 86.24% हो गया, जबकि इसी दौरान निजी क्षेत्र के बैंकों ने एनपीए में अपने हिस्से को 24.05% से घटाकर 10.43% कर लिय | इस स्तिथि से पीएसबी की लोन देने की प्रणाली , अर्थात् जोखिम मूल्यांकन और उचित मूल्यांकन पर गंभीर सवाल खड़े होते  हैं  | इसके अलावा ध्यान रखने वाली बात है कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र द्वारा दिए गए कुल अग्रिम राशि  में लगभग 75% सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का है | 

आमतौर पर बैंकअपने डूबे लोन के बढ़ने का एक  मुख्य कारण किसानों को दिए गए  क़र्ज़ बताते हैं | जांच  के बाद  यह पता चलता है की बड़े उद्योगों को दिए जा रहे और दिए गए लोन इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं |  वित्त वर्ष 2014-15 में पीएसबी के कुल एनपीए में प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र, (जिसमें कृषि, लघु उद्योग, माइक्रो क्रेडिट, शिक्षा और आवास शामिल हैं), का योगदान सिर्फ 34.69% था, जबकि शेष हिस्सा गैर प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र का था, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर और लौह एवं इस्पात उद्योग इत्यादि  हैं | दिसंबर 2014 में  सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए के शीर्ष 30 खातों की कुल राशि 95,122 करोड़ रुपये थी, ज पीएसबी के कुल एनपीए का एक तिहाई से ज़्यादा हिस्सा  था | इसके अलावा वित्त वर्ष 2014-15 में, आईडीबीआई बैंक के कुल एनपीए का 26.53 % हिस्सा जिन शीर्ष चार खातों का था, वे सभी गैर प्राथमिकता प्राप्त  क्षेत्र के थे | 

स्वतंत्र एजेंसियों और सरकारीसूत्रों द्वारा प्रकाशित कई रिपोर्टों ने भी इन तथ्यों की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया है  कि वास्तविकता में  गैर प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र भारी क़र्ज़ लेकर और उनका भुगतान ना करके जनता के पैसे हड़प रहा है | मई 2015 में वित्तीय सेवा फर्म स्टैंडर्ड चार्टर्ड द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2008-09 से 2014-2015 के बीच बीएसई लिस्टेड 500 कंपनियों के कुल लोन 20% के चक्रवृद्धि दर से बढ़े हैं, जबकि इस दौरान इनका मुनाफा उससे कहीं कम सिर्फ 9% के दर से बढ़ा हैं | अगस्त 2012 में क्रेडिट सुइस की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में लोन वृद्धि का एकाधिकार केवल  दस कॉर्पोरेट समूहों के पास था , जिसमें अदानी, एस्सार, जीएमआर, जीवीके, जेएसडब्ल्यू, जेपीए, लैंको, रिलायंस, एडीए, वेदांत और वीडियोकॉन शामिल हैं | इनका कुल कर्ज़ पिछले 5 सालों में 5 गुना बढ़ा  हैं, जो कुल बैंक लोन का 13%और बैंकिंग प्रणाली की 98% नेट वर्थ के बराबर हैं | 

इन्ही बातों का ध्यान रखते हुए, अगर बड़े लोन लेते समय कंपनियों द्वारा पीएसबी के पास रखे हुए उनके  कोलेटरल पर नज़र डाली जाए तो बैंकों के लोन देने की पूरी प्रक्रिया ही संदेहास्पद लगती है | ऐसे कोलेटरल, जिसके आधार पर कंपनियों को बड़े लोन दिए जाते हैं,उससे संबंधित जानकारी की भी काफी कमी होती है | विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कई मामलों में बैंकों ने कोलेटरल के रूप में ‘वर्चुअल  एसेट’ स्वीकार किए हैं,–जिसमें बैंकों के प्रमोटरों द्वारा गिरवी रखे गए शेयर, सहायक कंपनियों के शेयर, कंपनियों के ब्रांड नाम इत्यादि आते है | उदहारण के तौर पर, भारतीय स्टेट बैंक की अगुवाई में बैंकों के एक समूह ने किंगफिशर एयरलाइनस को 7,723 करोड़ रुपये के लोन दिए थे, जिसमें उन्होंने इतने बड़े लोन के खिलाफ किंगफिशर एयरलाइनस ब्रांड के नाम को कोलेटरल के रूप में उसका मूल्यांकन 4,111 करोड़ रूपयेकरते हुए स्वीकार किया था|  

इस प्रकार के  लोन कुछ जोखिम भरे क्षेत्रों में केंद्रित हैं | इसमें भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर, लौह एवं इस्पात, कपड़ा , खनन (कोयला सहित) और विमानन सबसे स्ट्रेस्ड क्षेत्र में से हैं | इसके अलावावित्त वर्ष 2014-15 में पूरे बैंकिंग उद्योग द्वारा दिए गए लोन में सिर्फ  बिजली क्षेत्र का हिस्सा 9.07% है | 

बैंक कॉर्पोरेट लोन की बुनियादी जानकारी जैसेलोन मंज़ूरी की तारीख, शर्तें, ब्याज दर, चुकाने की अवधि, सुरक्षित कोलेटरल और कितनी बार रीस्ट्रक्की गई जानकारी , सार्वजनिक नहीं करते हैं औरआम जनता को जान-बूझकर अंधेरे में रखते है | इसके अलावा जो  एनपीए सम्बंधित आंकड़ें बैंकों ने सार्वजनिक किए हैं, उनसे सम्बंधित जानकारी भी पर्याप्त नहीं है | 

पीएसबी प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को मुख्य रूप से लोन देने के बजाय कॉर्पोरेट लोन लेने वालों के पक्षधर बन चुके हैं । पीएसबी अनुचित ढंग से नियोजित परियोजनाओं को बेतहाशा क़र्ज़ दे रहे ह और इसके साथ ही जोखिम भरे क्षेत्रों में भी भारी निवेश कर रहे हैं | यह स्थिति  सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के भीतर भ्रष्टाचार की याद दिलाता है है, जो उचित मूल्यांकन  और जोखिम आंकलनजैसे  अंदरूनी तंत्रों के अभाव में बढ़ रहा है | 

सरकार और आरबीआई ने बढ़ते एनपीए की समस्या के समाधान के लिए कई उपाय शुरू किए हैं, जैसे - कॉरपोरेट ऋण पुनर्गठन, 5/25 ऋण पुनर्गठन योजना, सामरिक ऋण पुनर्गठन (एसडीआर) योजना, पूंजी निवेश, ऋण वसूली न्यायाधिकरण और सरफेसी अधिनियम 2002 | कर्ज़ों को रीस्ट्रक्चर करना एक ऐसा विकल्प है जिसको केवल अंतिम उपाय के रूप में अपनाया जाना चाहिए, लेकिन कंपनियों के लिए यह अपेक्षाकृतआसान रास्ता बन चूका  है | वर्ष 2007-08 से वर्ष 2013-14 के दौरान पीएसबी द्वारा रीस्ट्रक्चर्ड कॉर्पोरेट लोन की राशि 2,432 करोड़ रुपए से बढ़कर 1,80,300 करोड़ रुपए हो गई है| इसी दौरान निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए ये आंकड़ें 581 करोड़ रुपए से बढ़कर 25,455 करोड़ रुपए हुए हैं | अधिकांश पुनर्गठन योजनाएं, समस्या की जड़ तक  जाने की बजाय, एनपीए की समस्या पर पर्दा डालने का काम कर रही हैं | 

बैंकिंग व्यस्था जनता के पैसे से चलती  है और सरकार भी बैंकों में पूँजी की कमी होने पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकोंमें पूंजी निवेश करती है | इसलिए उन्हें  लोकतांत्रिक ढंग से उत्तरदायी और पारदर्शी व्यवस्था के प्रति जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए | बैंकों, विशेषकर राष्ट्रीयकृत बैंकों, के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वे 100 करोड़ रुपए से ऊपर के लोन से जुड़ी हर जानकारी सार्वजनिक करें | एनपीए केऊँचे स्तर बैंकों की मौजूदा लोन देने की प्रक्रिया  की अक्षमता और सीमा बतलाती हैं | सरकार और आरबीआई द्वारा इन  तंत्रों पर करीब से नज़र डालने पर पता चलता है कि ये तंत्र मुख्यत: एनपीए की स्थिति में सुधार करने के लिए बनाए गए हैं, ऐसे तंत्र नाहि दूरदर्शी हैं और नाहि एनपीए को बढ़नेसे रोक पाने में सक्षम हैं | 


ऐसे समय में सरकार और आरबीआई को लोन देने की प्रक्रिया में सुधार के लिए  उपाय करने की सख्त जरुरत है । जनता के पैसों से हज़ारों करोड़ रुपये के लोन मंजूर करने और उन्हें कई-कई बार रीस्ट्रक्चर करने के निर्णय, बोर्ड और बैंकों के प्रबंधन में बैठे मुठ्ठी-भर लोगों के विवेक पर नहीं छोड़े जा सकते । बैंकों द्वारा की जाने वाली उचित मूल्यांकन  और जोखिम आंकलन  नीतियों की समीक्षा और उनकी दक्षता का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए | इस तरह के निर्णयों और व्यवहार को, नियमित रूप से, संसद और एक सार्वजनिक प्राधिकार की जांच के दायरे में लाते हुए जनता के बीच भी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए | सरकार को बैंकों, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, का उचित कार्यान्वन सुनिश्चित करने के लिए कानूनी निरीक्षण विकसित करना चाहिए | 


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